सैनिकों की मांओं का साहस, जिनके दिल में गर्व भी और चिंता भी
नई दिल्ली: सीमा पर तैनात प्रहरियों की माताओं के लिए फोन की हर घंटी दिल की धड़कनें बढ़ा देने वाली होती है, जिसमें एक अनजाना सा डर और असीम खुशी दोनों छिपे होते हैं। इन वीर जननियों के लिए अपने बेटे का एक 'हेलो मां' कहना सारी चिंताओं को पल भर में दूर कर देता है, भले ही देश की सीमाओं पर तनाव की स्थिति क्यों न हो। सवा सौ करोड़ भारतीयों की चैन की नींद के लिए सीने पर गोली झेलने को तैयार जवानों की माताओं का जीवन गर्व और फिक्र के बीच के एक ऐसे संतुलन की कहानी है, जिसे केवल एक फौजी का परिवार ही गहराई से महसूस कर सकता है।
बचपन के सपनों से आसमान की ऊंचाइयों तक का सफर
एक फौजी मां ने अपनी स्मृतियां साझा करते हुए बताया कि उनके बेटे के मन में देश सेवा का जज्बा बचपन से ही हिलोरे मार रहा था, जब वह अपने कर्नल पिता के जूतों में छोटे कदम डालकर 'जय हिंद' का उद्घोष किया करता था। आज वही बेटा एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के आकर्षक ऑफर को ठुकरा कर भारतीय वायुसेना में ट्रांसपोर्ट पायलट के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहा है। मां को इस बात पर गर्व है कि उनका बेटा न केवल सीमाओं की रक्षा कर रहा है, बल्कि उनकी भावनाओं का ख्याल रखते हुए कई बार खतरनाक ऑपरेशनों की जानकारी भी काम पूरा होने के बाद ही देता है ताकि घर पर कोई विचलित न हो।
त्योहारों का सूनापन और परंपरा का गौरव
उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों में सेना में जाना केवल एक पेशा नहीं बल्कि एक महान पारिवारिक परंपरा और सम्मान का विषय माना जाता है, जहाँ एक ही घर के कई सदस्य देश की सेवा में समर्पित होते हैं। ऐसी ही एक मां, जिनके पति और दोनों बेटे सेना का हिस्सा रहे हैं, कहती हैं कि होली और दिवाली जैसे बड़े त्योहारों पर जब आसपास के घरों में खुशियां मनाई जाती हैं, तब अपने बेटों की कमी सबसे ज्यादा खलती है। हालांकि, दूसरे बच्चों को घर लौटते देख मन भावुक जरूर होता है, लेकिन यह सोचकर सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है कि उनके लाल पूरे देश के त्योहारों को सुरक्षित बना रहे हैं।
फौजी परिवारों की अटूट विरासत और वीरता की आदत
कुछ परिवारों के लिए फौज में होना एक आदत और जीवन जीने का तरीका बन चुका है, जहाँ पीढ़ी दर पीढ़ी वर्दी पहनने का सिलसिला जारी है। एक कर्नल की मां बताती हैं कि उनके पिता सूबेदार मेजर थे, पति कैप्टन रहे और अब बेटा तथा बेटी दोनों ने सेना के माध्यम से राष्ट्र की सेवा की है, जिससे डर अब गर्व की छाया में छिप गया है। वहीं, जिन माताओं के बेटे जल सेना या पैरामिलिट्री में कठिन परिस्थितियों के बीच तैनात हैं, वे कहती हैं कि उनके बच्चे अपने साथ होने वाले खतरों को भी किसी फिल्मी किस्से की तरह सुनाते हैं ताकि मां का दिल कमजोर न पड़े और वे मुस्कुराते हुए फोन रख सकें।
