गुरुग्राम। ईडी गुरुग्राम ने एम/एस रिचा इंडस्ट्रीज लिमिटेड के पूर्व रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल अरविंद कुमार को मनी लॉड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) 2002 के प्रावधानों के तहत गिरफ्तार किया है। उन्हें गुरुग्राम की स्पेशल कोर्ट में पेश किया गया। जहां से उन्हें आठ दिन के ईडी के रिमांड पर भेज दिया गया। इससे पहले, पूर्व प्रमोटर और सस्पेंडेड मैनेजिंग डायरेक्टर, संदीप गुप्ता को पीएमएलए की धारा 19 के तहत गिरफ्तार किया गया था। ईडी ने सीबीआई द्वारा आईपीसी की धाराओ के तहत पीसी एक्ट 1988 के तहत दर्ज मामले में जांच शुरू की थी। इस मामले में आरोपियों द्वारा आपराधिक साज़िश, धोखाधड़ी और आपराधिक कदाचार के अपराध किए गए थे, जिससे उन्होंने खुद को गलत फायदा पहुंचाया और 2015 से 2018 के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को लगभग 236 करोड़ रुपये का भारी नुकसान पहुंचाया था। जांच में सामने आया कि अरविंद कुमार द्वारा व्यक्तिगत रूप से धन कमाने का पता चलता है, जिससे मनी लॉन्ड्रिंग में उनकी सीधी और सक्रिय भागीदारी साबित हुई।रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान, रिचा इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड से बड़ी रकम लेयर्ड ट्रांज़ेक्शन के ज़रिए उनसे जुड़े व्यक्तियों और संस्थाओं को ट्रांसफर की गई, जिसमें उनके अपने बिज़नेस से जुड़े सहयोगी और कर्मचारी शामिल थे। कॉर्पोरेट देनदार के खातों से इन बिचौलियों को बड़े भुगतान किए गए, जिन्होंने बाद में बड़ी रकम अरविंद कुमार के पर्सनल बैंक खातों में ट्रांसफर कर दी। बैंक रिकॉर्ड से यह भी सामने आया है कि उनकी नियुक्ति की अवधि के दौरान उनके पर्सनल खातों में 80 लाख रुपये से ज़्यादा के बिना बताए कैश जमा किए गए थे, साथ ही उनके संबंधित पक्षों से 1 करोड़ रुपये से ज़्यादा की रकम क्रेडिट हुई थी, जो पहले कंपनी से भुगतान के लाभार्थी थे।ईडी की जांच में पता चला कि गिरफ्तार रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल मूल बैंक धोखाधड़ी से अपराध की आय का लाभार्थी था, जिसने सीआईआरपी से संबंधित ऑपरेशन्स की आड़ में अवैध धन को वैध प्राप्तियों के रूप में दिखाया। अब तक की जांच में गिरफ्तार अरविंद (आरपी) द्वारा अपनाए गए तौर-तरीके सामने आए हैं। असुरक्षित वित्तीय लेनदारों के फर्जी और बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए दावों को जानबूझकर स्वीकार कर लेनदारों की एक अवैध और हेरफेर वाली समिति का गठन करना, जिनमें से कई पूर्व प्रमोटरों द्वारा नियंत्रित डमी/प्रॉक्सी थे, जिन्होंने बैंक धोखाधड़ी की साजिश रची थी। जिससे निलंबित प्रमोटरों को निर्णायक वोटिंग शक्ति मिली और असली सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक लेनदारों को दरकिनार कर दिया गया।ईडी की जांच में यह भी सामने आया कि रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल के प्रमोटर-समर्थक साजिश रचने के कृत्यों के कारण, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को चौंका देने वाला 94 फीसदी नुकसान हुआ। रिचा इंडस्ट्रीज लिमिटेड के परिसमापन के बाद, बैंकों को 708 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के मुकाबले सिर्फ चार करोड़ रुपये मिले हैं।